मिर्जा गालिब की हवेली (कब, कैसे पहुंचें, एंट्री टिकट, टाइमिंग, नजदीकी मेट्रो स्टेशन)

मिर्जा गालिब की हवेली (Mirza Galib ki Haveli) पुरानी दिल्ली (Old Delhi) के चांदनी चौक से सटे बल्लीमारान की गली कासिम जान में स्थित है। मिर्जा गालिब को जानने-समझने वालों को यहां जरूर आना चाहिए। इसी हवेली में गालिब ने अपनी आखिरी सांस ली थी। इतना ही नहीं, यहीं बैठकर उन्होंने उर्दू और फारसी में दीवान की रचना की थी। यहां गालिब से जुड़ी दुर्लभ ऐतिहासिक विरासत से आप रूबरू हो सकते हैं। यहां पहुंचना हर किसी के लिए बहुत ही आसान है।

हवेली का इतिहास

मिर्जा गालिब को यह घर एक हकीम द्वारा दिया गया था। वह गालिब के बहुत बड़े प्रशंसक थे। गालिब आगरा से दिल्ली आने के बाद 1860 से 1869 तक इसी हवेली में रहे। 15 फरवरी, 1869 में गालिब की मृत्यु के बाद हकीम हर शाम यहां बैठा करते थे। वह यहां किसी को आने नहीं देते थे। गालिब के निधन के बाद से 1999 तक यहां दुकानें लगनी लगी थीं। 1999 में सरकार की ओर से इस हवेली को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। हालांकि, कब्जों की वजह से 500 एकड़ में बनी यह हवेली अब 150 एकड़ में ही रह गई है। हवेली का निर्माण लाखोरी ईंटों और चूने के मोर्टार सहित पारंपरिक सामग्री से किया गया है।

मिर्जा गालिब के बारे में

मिर्जा गालिब उर्फ मिर्जा असद उल्लाह बेग खां उर्फ गालिब उर्दू और फारसी के महान शायर थे। तुर्क परिवार की पृष्ठभूमि से जुड़े गालिब का जन्म मोहल्ला काला महल, आगरा में हुआ था। इनके दादा मध्य एशिया के समरकंद से 1750 ईस्वी के करीब भारत आए थे। गालिब ने 11 वर्ष की उम्र में ही शायरी लिखनी शुरू कर दी थी। 13 वर्ष की आयु में उनकी शादी उमराव बेगम से हो गया। गालिब मुगल साम्राज्य के आखिरी शासक बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि भी रहे। कहा जाता है कि गालिब के सात बच्चे हुए, पर दुर्भाग्यवश उनमें से एक भी जिंदा नहीं बचा।

गालिब की हवेली और उसमें संरक्षित उनसे जुड़ी धरोहर।

मिर्जा गालिब की हवेली में क्या देखें

गालिब की हवेली में घुसते ही गालिब का स्टैच्यू दिखेगा। इसके दोनों ओर गालिब की रचनाएं दिखेंगी। हवेली में जगह-जगह दीवारों पर गालिब की रचनाओं के पोर्ट्रेट लगाए गए हैं। यहां गालिब के अलावा उनके समकालीन शायरों के चित्र भी लगाए गए हैं। इस हवेली में आप गालिब द्वारा खेले गए चौसर, शतरंज की बिसातें, उनकी पुरानी पुस्तकें और बर्तन भी देख सकते हैं। यहां एक कमरे में मिर्जा गालिब की अचकन और उनकी बेगम के वस्त्र रखे गए हैं।

हवेली कैसे पहुंचें

चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से मिर्जा गालिब की हवेली की दूरी करीब 1 किलोमीटर है। यहां उतरकर हवेली आसानी से पहुंचा जा सकता है। चांदनी चौक से भी आप रिक्शे या ऑटो से हवेली तक पहुंच सकते हैं।

हवेली खुलने के दिन और समय

मिर्जा गालिब की हवेली सोमवार को छोड़कर हफ्ते के बाकी दिन सुबह 11 बजे से लेकर शाम छह बजे तक खुली रहती है। सोमवार को यह बंद रहती है।

हवेली के लिए टिकट दर

मिर्जा गालिब की हवेली में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं लगता है। यहां एंट्री निशुल्क है। हवेली में आप कैमरे से फोटो ले सकते हैं। यहां किसी तरह की कोई मनाही नहीं है।

आसपास और क्या देखें

मिर्जा गालिब की हवेली देखने के साथ-साथ आसपास अन्य कई स्थानों पर भी घूमा जा सकता है। चांदनी चौक मार्केट, परांठे वाली गली, लाल किला, जामा मस्जिद, इंडिया गेट, पुराना किला, इंटरनेशनल डॉल म्यूजियम, जंतर मंतर आदि यहां से नजदीक पड़ते हैं। आप कहीं भी जा सकते हैं।

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