अजमेर शरीफ दरगाह : ख्वाजा गरीब नवाज हर मन्नत करते हैं पूरी

राजस्थान में स्थित अजमेर (Ajmer) दुनियाभर में अजमेर शरीफ दरगाह (Ajmer Sharif Dargah) के लिए प्रसिद्ध है। इसका 800 साल पुराना इतिहास है। चारों तरफ से अरावली की पहाड़ियों में घिरे इस शहर की जयपुर से दूरी करीब 135 किलोमीटर है। यहां मौजूद सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह सर्व धर्म समभाव की मिसाल है। यहां सभी धर्मों के लोग जियारत करने के लिए आते हैं और चादर चढ़ाते हैं। यहां दुनिया की कई बड़ी हस्तियों समेत अनेक सेलेब्रिटी भी सज्दा करने के लिए आ चुके हैं। संत मोइनुद्दीन चिश्ती को ख्वाजा गरीब नवाज भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से यहां मांगी गई हर मन्नत जरूर पूरी होती है। जो कोई एक बार आकर मन्नत मांगता है, मन्नत पूरी होने के बाद वह दूसरी बार यहां फिर जरूर आता है।

अकबर आया था पैदल चलकर

मुगल सम्राट अकबर की इस दरगाह के प्रति अटूट आस्था थी। उसने खुद के बेटे के लिए मन्नत मांगी थी। ऊपर वाले ने उसकी सुन ली और उसके घर जहांगीर का जन्म हुआ। कहा जाता है कि इसके बाद 1570 में अकबर आगरा से 437 किलोमीटर पैदल चलकर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पहुंचा था। यहां उसने कई दिन बिताए थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत कई बड़ी हस्तियां यहां आकर मत्था टेक चुकी हैं।

दरगाह का निर्माण और बनावट

इतिहासकारों के अनुसार सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने 1465 में अजमेर शरीफ दरगाह का निर्माण करवाया था। मुगल सम्राट हुमायूं, अकबर, शाहजहां और जहांगीर ने अपने शासनकाल में इसका विकास करवाया। यहां राजा मान सिंह का लगाया चांदी का कटहरा और ब्रिटिश महारानी मेरी क्वीन का अकीदत के रूप में बनवाया गया वजू का हौज आस्था का प्रमुख केंद्र है। अजमेर शरीफ की दरगाह में प्रवेश के लिए चारों तरफ भव्य दरवाजे बनाए गए हैं। इनमें निजाम गेट, शाहजहानी गेट (नक्कारखाना), बुलंद दरवाजा और जन्नती दरवाजा प्रमुख है। दरगाह के अंदर भव्य शाहजहानी मस्जिद बनी हुई है।

संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के बारे में

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती प्रसिद्ध संत के साथ-साथ प्रमुख इस्लामिक विद्वान और दार्शनिक भी थे। उन्होंने पैदल हज की यात्रा की थी। अपनी चमत्कारिक शक्तियों की वजह से वह काफी लोकप्रिय हो गए थे। 1192 से 1195 के बीच उन्होंने भारत की यात्रा की। वे दिल्ली और लाहौर भी गए पर उन्हें अजमेर इतना पसंद आया कि उन्होंने यही रुकने का फैसला किया। वे यहीं के होकर रह गए और अपने सूफी दर्शन से उन्होंने अजमेर को सर्व धर्म की नगरी बना दी।

ख्वाजा गरीब नवाज ने 114 साल की उम्र में आखिरी समय में खुद 6 दिन तक एक कमरे में बंद कर लिया और वहीं अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया। जहां उन्होंने अपनी देह त्यागी थी, उसी जगह पर उनका मकबरा बना दिया गया। इसे ही आज अजमेर शरीफ की दरगाह के रूप में जाना जाता है।

दरगाह में जाने से पहले क्या ध्यान रखें

दरगाह में खुले सिर में जाने पर पाबंदी है। यहां अपना सिर ढककर ही जाना होता है। प्रवेश से पहले आपको हाथ-पैर साफ करने की जरूरत पड़ती है। अंदर सामान और कैमरा आदि ले जाने पर पाबंदी है, इसलिए इन्हें ले जाने से बचें।

कैसे और कब जाएं अजमेर शरीफ, कहां ठहरें

नेशनल हाईवे-48 से दिल्ली से अजमेर की दूरी करीब 404 किलोमीटर है। यहां अपने वाहन से पहुंचने में करीब सात घंटे लगते हैं। दिल्ली से अजमेर के लिए रोज 7 ट्रेन चलती हैं। आप उनसे भी यहां पहुंच सकते हैं। अजमेर का नजदीकी एयरपोर्ट किशनगढ़ एयरपोर्ट है। यहां से अजमेर की दूरी 27 किलोमीटर है। आप जयपुर एयरपोर्ट उतरकर भी अजमेर पहुंच सकते हैं। हालांकि, यहां से दूरी ज्यादा पड़ेगी। संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की पुण्यतिथि पर उर्स के रूप में सालाना 6 दिन का उत्सव यहां बहुत ही अकीदत से मनाया जाता है। इस दौरान आप यहां घूमने जा सकते हैं। अजमेर में आपको 900 से 2500 रुपये में होटल मिल जाएंगे। यहां कई सस्ते ओयो होटल भी आसानी से मिल जाते हैं। धर्मशालाओं में रुकना और भी सस्ता पड़ता है।

अजमेर में और कहां घूमें

अजमेर दौरे के दौरान आप संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के अलावा तारागढ़ फोर्ट, फोर्ट मसूदा अजमेर, अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, अकबरी मस्जिद, किशनगढ़ किला, अकबर का महल और संग्रहालय, नारेली जैन मंदिर और साईं बाबा मंदिर आदि घूम सकते हैं।

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